॥ अर्गला स्तोत्रम् ॥
Argala Stotram — to Goddess Durga (Devī Māhātmya prelude)
ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
इस श्री अर्गला स्तोत्र मन्त्र के ऋषि विष्णु, छन्द अनुष्टुप्,
श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः॥
देवता श्री महालक्ष्मी हैं — जगदम्बा की प्रसन्नता हेतु सप्तशती-पाठ के अंग रूप में जप का विनियोग।
ॐ नमश्चण्डिकायै॥ मार्कण्डेय उवाच
ॐ, चण्डिका को नमस्कार। मार्कण्डेय बोले:
Viniyoga: seer Viṣṇu, meter Anuṣṭup, deity Śrī Mahālakṣmī — recited as part of the Saptaśatī to please Jagadambā. Salutations to Caṇḍikā. Mārkaṇḍeya said:
1ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
ॐ, आप ही जयन्ती, मङ्गला, काली, भद्रकाली, कपालिनी हैं,
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा व स्वधा हैं — आपको नमस्कार!
You are Jayantī, Maṅgalā, Kālī, Bhadrakālī, Kapālinī, Durgā, Kṣamā, Śivā, Dhātrī, Svāhā and Svadhā — salutations to you!
2जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।
हे देवि चामुण्डा, आपकी जय; प्राणियों का दुःख हरने वाली, आपकी जय।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥
हे सर्वव्यापिनी देवि कालरात्रि, आपकी जय — आपको नमस्कार!
Victory to you, Cāmuṇḍā, remover of beings' distress; all-pervading Kālarātri — salutations!
3मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः।
मधु व कैटभ का नाश कर वरदान देने वाली को नमस्कार।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
Salutations to her who gave boons after slaying Madhu & Kaiṭabha. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
4महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः।
महिषासुर का नाश करने वाली, भक्तों को सुख देने वाली को नमस्कार।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
Slayer of Mahiṣāsura, giver of joy to devotees. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
5रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि।
हे देवि, रक्तबीज का वध व चण्ड-मुण्ड का नाश करने वाली।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
O Goddess, slayer of Raktabīja, destroyer of Caṇḍa & Muṇḍa. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
6शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि।
शुम्भ, निशुम्भ व धूम्राक्ष का मर्दन करने वाली।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
Crusher of Śumbha, Niśumbha & Dhūmrākṣa. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
7वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि।
हे देवि, जिनके चरण पूजित हैं, सब सौभाग्य देने वाली।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
O Goddess whose feet are worshipped, bestower of all auspiciousness. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
8अचिन्त्यरुपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
अचिन्त्य रूप व चरित्र वाली, सब शत्रुओं का नाश करने वाली।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
Of inconceivable form & deeds, destroyer of all enemies. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
9नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
हे चण्डिके, भक्ति से नमन करने वालों का दुःख हरने वाली।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
O Caṇḍikā, remover of suffering for the devoted. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
10स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि।
हे चण्डिके, रोगों का नाश करने वाली, भक्तिपूर्वक स्तुत।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
O Caṇḍikā, destroyer of disease for those who praise you. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
11चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।
हे चण्डिके, जो सदा भक्ति से आपकी पूजा करते हैं।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
O Caṇḍikā, for those who ever worship you with devotion. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
12देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
मुझे सौभाग्य, आरोग्य व परम सुख प्रदान करो।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
Grant good fortune, health & supreme happiness. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
13विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
शत्रुओं का नाश करो, मुझे महान बल दो।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
Destroy my enemies, grant me great strength. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
14विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।
हे देवि, कल्याण व परम श्री (समृद्धि) प्रदान करो।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
O Goddess, grant wellbeing & supreme prosperity. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
15सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके।
हे अम्बिके, जिनके चरण देवताओं व असुरों के मुकुटों से स्पर्शित हैं।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
O Mother, whose feet are touched by the crowns of gods & demons. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
16विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
मुझे विद्यावान, यशस्वी व लक्ष्मीवान बनाओ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
Make me learned, famous & prosperous. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
17प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
हे चण्डिके, प्रचण्ड दैत्यों के दर्प का नाश करने वाली — मैं नमन करता हूँ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
O Caṇḍikā, destroyer of fierce demons' pride — I bow to you. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
18चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि।
हे परमेश्वरि, चार भुजाओं वाली, चतुर्मुख ब्रह्मा से स्तुत।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
O supreme Goddess, four-armed, praised by four-faced Brahmā. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
19कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके।
हे माता, कृष्ण द्वारा सदा भक्ति से स्तुत।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
O Mother, ever praised by Kṛṣṇa with devotion. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
20हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।
शिव (हिमालय-सुता के नाथ) द्वारा स्तुत परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
Praised by Śiva (lord of Himavat's daughter). → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
21इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।
इन्द्र द्वारा सद्भाव से पूजित परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
Worshipped devoutly by Indra. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
22देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।
हे देवि, प्रचण्ड भुजाओं से दैत्यों के दर्प का नाश करने वाली।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
O Goddess, whose mighty arms shatter demons' pride. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
23देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके।
हे अम्बिके, भक्तों को अपार आनन्द देने वाली।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे रूप, विजय व यश दो; मेरे शत्रुओं का नाश करो।
O Mother, giver of boundless joy to devotees. → Grant me beauty, victory & fame; destroy my foes.
24पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
मुझे मनोनुकूल, सुंदर पत्नी दो,
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥
जो कुलीन हो और संसार-सागर से पार लगाए।
Grant a loving, like-minded spouse of noble birth who helps me cross the ocean of saṃsāra.
25इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
जो इस स्तोत्र को पढ़कर फिर महास्तोत्र (सप्तशती) पढ़ता है,
स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥
वह पूरे सप्तशती-पाठ का फल व महान समृद्धि पाता है।
॥ इति देव्या अर्गलास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
इस प्रकार देवी का अर्गला स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।
Whoever recites this, then the great hymn, gains the full merit of the Saptaśatī and great prosperity. Thus ends the Argalā Stotram.
॥ श्री सूक्तम् ॥
Sri Suktam — to Goddess Lakshmi (Rig Veda) · हरिः ॐ
1हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
स्वर्णवर्णा, सुंदर, सोने-चाँदी की माला से सजी,
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
चंद्र-सी स्वर्णिम आभा वाली लक्ष्मी का, हे अग्नि, मेरे लिए आवाहन करो।
O Agni, invoke Lakṣmī — golden-hued, lovely, adorned with gold & silver, moon-like with a golden glow.
2तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
हे अग्नि, उस अविनाशी लक्ष्मी का मेरे लिए आवाहन करो,
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥
जिनकी कृपा से मुझे स्वर्ण, गौ, अश्व, सेवक तथा बल, धन व यश (बलं धनं यशः) भी प्राप्त हों।
Invoke that Lakṣmī who never departs — by whose grace I gain gold, cattle, horses, attendants, and also power, wealth & fame (बलं धनं यशः).
3अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम्।
जिनके आगे अश्व, बीच में रथ, व हाथियों की गर्जना से जिनका आगमन घोषित होता है,
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्॥
उन श्री देवी का आवाहन करता हूँ; समृद्धि की देवी मुझ पर प्रसन्न हों।
I invoke Śrī — heralded by horses, chariot & trumpeting elephants. May the Goddess of prosperity favour me.
4कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
मंद मुस्कान वाली, स्वर्ण-आभा से घिरी, तेजस्विनी, तृप्त व तृप्त करने वाली,
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥
कमल पर विराजमान, कमलवर्णा उन श्री को यहाँ आमंत्रित करता हूँ।
Softly smiling, ringed in golden glow, radiant, content & fulfilling — seated on a lotus, lotus-hued. I invoke her here.
5चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
चंद्र-सी उज्ज्वल, यशस्विनी, उदार, देवों से पूजित श्री,
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥
उन कमलवासिनी की मैं शरण लेता हूँ; मेरी दरिद्रता (अलक्ष्मी) नष्ट हो — आपका वरण करता हूँ।
Moon-bright, glorious, noble, worshipped by gods — I take refuge in her. May misfortune (Alakṣmī) be destroyed.
6आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
हे सूर्य-वर्णा, तप से उत्पन्न बिल्व वृक्ष आपका है,
तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥
उसके फल भीतरी मोह व बाहरी दरिद्रता को दूर करें।
Sun-hued, born of tapas like the sacred Bilva tree — may its fruits drive away inner delusion & outer misfortune.
7उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
कुबेर, कीर्ति व रत्न मुझे प्राप्त हों;
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥
इस राष्ट्र में उत्पन्न होकर मुझे कीर्ति व ऋद्धि मिले।
May Kubera, fame & jewels come to me; born in this land, may I be granted fame & prosperity.
8क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
भूख, प्यास व ज्येष्ठा अलक्ष्मी को मैं नष्ट करता हूँ;
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥
मेरे घर से सारी दरिद्रता व अभाव दूर करो।
Destroy hunger, thirst & the elder Alakṣmī; drive all poverty & ill-fortune from my home.
9गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
सुगंध की स्रोत, दुर्धर्ष, नित्य-पुष्ट, समृद्ध,
ईश्वरींग् सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥
सब प्राणियों की स्वामिनी उन श्री को यहाँ आमंत्रित करता हूँ।
Source of all fragrance, unassailable, ever-full, abundant, ruler of all beings — I invoke her here.
10मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
मुझे मन की कामना व सत्य वाणी प्राप्त हो;
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥
गौ, सौंदर्य, अन्न, समृद्धि व यश मुझमें निवास करें।
May I gain my heart's wish & truthful speech; may cattle, beauty, food, prosperity & fame dwell in me.
11कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम।
हे कर्दम (लक्ष्मी-पुत्र), मेरे साथ निवास करो,
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥
और कमल-मालिनी माता श्री को मेरे कुल में बसाओ।
O Kardama (her son), abide with me and settle your mother, lotus-garlanded Śrī, in my family.
12आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
हे चिक्लीत, मेरे घर में निवास करो,
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥
और अपनी माता देवी श्री को मेरे कुल में बसाओ।
O Chiklīta, dwell in my home and bring your mother, Devī Śrī, to reside in my family.
13आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।
कमल-सरोवर-सी शीतल, पोषक, पिंगलवर्णा, कमल-मालिनी,
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
चंद्र-सी स्वर्णिम आभा वाली लक्ष्मी का, हे अग्नि, आवाहन करो।
O Agni, invoke Lakṣmī — soothing like a lotus-pond, nourishing, tawny-golden, lotus-garlanded, moon-like with a golden glow.
14आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
कर्म को सहारा देने वाली आर्द्र-शक्ति, स्वर्ण-मालिनी,
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
सूर्य-सी स्वर्णिम आभा वाली लक्ष्मी का, हे अग्नि, आवाहन करो।
O Agni, invoke Lakṣmī — moist energy that sustains action, gold-garlanded, sun-like with a golden glow.
15तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
हे अग्नि, उस अविनाशी लक्ष्मी का मेरे लिए आवाहन करो,
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्॥
जिनकी कृपा से मुझे प्रचुर स्वर्ण, गौ, सेवक, अश्व, संतान तथा बल, धन व यश (बलं धनं यशः) भी प्राप्त हों।
Invoke the Lakṣmī who never departs — by whose grace I gain abundant gold, cattle, servants, horses, progeny, and also power, wealth & fame (बलं धनं यशः).
॥ कनकधारा स्तोत्रम् ॥
Kanakadhara Stotram — to Goddess Lakshmi (by Adi Shankaracharya)
1अंगं हरे: पुलकभूषण माश्रयन्ती भृंगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम्।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:॥
जैसे भ्रमरी कलियों से सजे तमाल वृक्ष का सहारा लेती है, वैसे ही महालक्ष्मी की कृपादृष्टि श्रीहरि के अंगों पर पड़ती है — वह मंगलमयी दृष्टि मुझे शुभ फल दे।
2मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारे: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवाया:॥
जो प्रेम और लज्जा से बार-बार श्रीहरि के मुख की ओर जाती और लौटती है, कमल पर मंडराती भ्रमरी जैसी — समुद्र से जन्मी लक्ष्मी की वह दृष्टि मुझे धन दे।
3विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतुरधिकं मधुविद्विषोऽपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धमिन्दीवरोदर सहोदरमिन्दिराया:॥
जो इंद्रपद तक दे सकती है और विष्णु को भी आनंद देती है, नीलकमल-सी वह लक्ष्मी की आधी चितवन क्षण भर मुझ पर भी पड़े।
4आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दमनिमेषमनंगतन्त्रम्।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगशयांगनाया:॥
प्रेम से आधी मुँदी, मुकुंद की ओर टिकी उनकी दृष्टि — शेषशायी विष्णु की उन प्रिया लक्ष्मी की वह दृष्टि मुझे ऐश्वर्य दे।
5बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयाया:॥
जो श्रीहरि के कौस्तुभ-मंडित वक्ष पर नीलमणि की माला-सी सजती है और उनमें भी प्रेम जगाती है — कमला की वह कटाक्षमाला मेरा कल्याण करे।
6कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव।
मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिर्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:॥
जैसे मेघ पर बिजली चमके, वैसे विष्णु के श्याम वक्ष पर शोभित, समस्त जगत की माता, भृगुनंदिनी लक्ष्मी की पूजनीय मूर्ति मुझे कल्याण दे।
7प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजिनि मधुमाथिनि मन्मथेन।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:॥
जिनकी मंद दृष्टि के प्रभाव से कामदेव ने पहली बार विष्णु के हृदय में स्थान पाया — समुद्रकन्या की वह धीमी, अलसाई दृष्टि मुझ पर पड़े।
8दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारामस्मिन्नकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:॥
दया की हवा से भरा लक्ष्मी के नेत्रों का बादल इस दीन चातक-शिशु पर धन की वर्षा करे और मेरे बुरे कर्मों का ताप दूर हटा दे।
9इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्रदृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते।
दृष्टि: प्रहृष्टकमलोदर दीप्तिरिष्टां पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टराया:॥
जिनकी दयादृष्टि से बुद्धिमान भी सहज स्वर्ग पा लेते हैं — कमल पर विराजमान लक्ष्मी की वह खिली दृष्टि मुझे मनचाही समृद्धि दे।
10गीर्देवतेति गरुडध्वजभामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैक गुरोस्तरुण्यै॥
सृष्टि में सरस्वती, स्थिति में विष्णुप्रिया, प्रलय में शाकम्भरी/पार्वती रूप में विराजमान — त्रिभुवन के गुरु की उन नित्ययौवना प्रिया को नमस्कार।
11श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोऽस्तु रमणीय गुणार्णवायै।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्र निकेतनायै पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तम वल्लभायै॥
शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति को, सुंदर गुणों की सागर रति को, कमल में बसने वाली शक्ति को, और पुरुषोत्तम-प्रिया पुष्टि को नमस्कार।
12नमोऽस्तु नालीक निभाननायै नमोऽस्तु दुग्धोदधि जन्म भूत्यै।
नमोऽस्तु सोमामृत सोदरायै नमोऽस्तु नारायण वल्लभायै॥
कमल-मुखी को नमस्कार, क्षीरसागर से जन्मी को नमस्कार, चंद्र व अमृत की बहन को नमस्कार, नारायण-प्रिया को नमस्कार।
13सम्पत्कराणि सकलेन्द्रिय नन्दनानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरुहाक्षि।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि मामेव मातरनिशं कलयन्तु नान्यम्॥
हे कमल-नयनी माता! आपको किए प्रणाम — जो संपत्ति, आनंद, साम्राज्य देते और सब पाप हरते हैं — सदा मुझे ही प्राप्त हों, किसी और को नहीं।
14यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य सकलार्थ सम्पद:।
सन्तनोति वचनांगमानसैस्त्वां मुरारि हृदयेश्वरीं भजे॥
जिनकी कृपादृष्टि की उपासना भक्त को सभी मनोरथ व संपत्ति देती है — उन मुरारि की हृदयेश्वरी लक्ष्मी को मैं मन, वचन व शरीर से भजता हूँ।
15सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्॥
कमल में बसने वाली, हाथ में कमल लिए, उज्ज्वल वस्त्र-गंध-माला से सजी, हरि-प्रिया, त्रिभुवन को ऐश्वर्य देने वाली देवी — मुझ पर प्रसन्न हों।
16दिग्घस्तिभि: कनककुम्भमुखावसृष्ट स्वर्वाहिनी विमलचारु जल प्लुतांगीम्।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणीममृताब्धिपुत्रीम्॥
दिशाओं के हाथियों द्वारा सोने के कलशों से आकाशगंगा के निर्मल जल से जिनका अभिषेक होता है — क्षीरसागर की पुत्री, विष्णु की गृहिणी, जगत-जननी लक्ष्मी को मैं प्रातः प्रणाम करता हूँ।
17कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरंगितैरपांगै:।
अवलोकय मामकिंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया:॥
हे कमले, कमल-नयन विष्णु की प्रिया! मैं दीनों में सबसे आगे और आपकी दया का सच्चा पात्र हूँ — करुणा से भरी तरंगित दृष्टि से मेरी ओर देखो।
18स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमीभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया:॥
॥ इति श्रीकनकधारास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
जो प्रतिदिन इन स्तुतियों से वेदत्रयी-स्वरूपा त्रिभुवन-जननी रमा की स्तुति करते हैं, वे गुणवान व परम भाग्यशाली होते हैं और विद्वान भी उन्हें आदर देते हैं। इस प्रकार श्री कनकधारा स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।